बाला किला

balkilaअलवर नगर के पश्चिम में एक हजार फुट ऊँची पहाड़ी पर बाला किला बना हुआ है | इसे निकुम्भ नरेशों ने गढ़ी किला बनवाया था | किला घेरे में 18 फुट ऊँची दीवारों का परकोटा है | किले में प्रवेश के लिए चार दरवाजे हैं | किले में 3359 कंगूरे , 15 बड़ी और छोटी बुर्जें हैं | सन 1942 में खानजादा अलावल खां ने इसे निकुम्भों से छीना था और किले को वर्तमान रूप दिया | उसके पुत्र हसनखां मेवाती ने जीर्णोंद्धार कराया | बाबर इस दुर्ग पर अपनी जीत के बाद 8 अप्रैल 1527 को आकर 8 दिन रहा और हुमायूँ को अपना खजाना सौंपा | सन 1550 में शेरशाह सूरी के हाकीम सलीम शाह के आदेश पर हकीम हाजी खां ने सलीम सागर बनवाया | बाद में हाजी खां स्वतंत्र शासक बन गया | अकबर के समय में यह मुगलों के कब्जे में आ गया | बादशाह शाह आलम से पहले भरतपुर के राजा सूरजमल जाट ने इसे जयपुर से छीन लिया और बाद में अलवर के प्रथम राजा प्रतापसिंह ने इस दुर्ग को बिना लड़े अपने कब्जे में ले लिया |


यह ऐतिहासिक कहानी है कि इस किले पर कभी युद्ध नहीं हुआ इसलिए इसे बाला किला या कुंवारा किला भी कहते हैं |

 किले की महल में चित्रकारी दर्शनीय है और छत पर खड़े होकर टेलिस्कोप से शहर को बारह बारह मील तक देखने का इस मौसम में अपना ही एक लुत्फ़ है | किला परिधि में करणी माता मन्दिर, चक्रधारी हनुमान मन्दिर, पुरोहितजी – किलेदार की कोठी, जयसिंह की यूरोपियन खंडर कोठी, बावड़ी, कुँए हैं | स्वतंत्र रूप से जंगली पशु – पक्षी यहाँ विचरण करते हैं |

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